पुरुषसूक्त (2 खंडों का सेट) – श्री महेशानंद गिरिजी
“पुरुषसूक्त” श्री महेशानंद गिरिजी द्वारा रचित एक अद्वितीय व्याख्यात्मक ग्रंथ है, जो ऋग्वेद के महत्वपूर्ण “पुरुषसूक्त” के गूढ़ रहस्यों और दार्शनिक अर्थों को सरल और सुबोध रूप में प्रस्तुत करता है। यह ग्रंथ दो खंडों में विभाजित है और भारतीय धर्म, दर्शन और आध्यात्मिकता में पुरुषसूक्त के महत्व को समझाता है।
“पुरुषसूक्त” एक वेदकालीन स्तुति है, जिसमें सृष्टि के मूल पुरुष, परमात्मा के विराट स्वरूप और संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। इसमें पुरुष (परमात्मा) की शक्ति, उसकी सार्वभौमिकता और जगत के निर्माण का विस्तार से उल्लेख मिलता है। श्री महेशानंद गिरिजी ने इस सूक्त के श्लोकों की गहन व्याख्या की है, जिसमें वैदिक दर्शन, वेदांत, और उपनिषदों के संदर्भों को जोड़ते हुए पुरुषसूक्त के आध्यात्मिक और भौतिक पक्षों का समन्वय किया गया है।






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