कायचिकित्सा (Kayacikitsa) आयुर्वेद का एक प्रमुख शाखा है जो मुख्यतः रोगों की चिकित्सा और उपचार से संबंधित है। “काय” का अर्थ शरीर और “चिकित्सा” का अर्थ उपचार होता है। कायचिकित्सा आयुर्वेद के आठ अंगों में से एक है और इसे आंतरिक चिकित्सा भी कहा जाता है।
कायचिकित्सा के अंतर्गत निम्नलिखित तत्व शामिल होते हैं:
- रोगों का निदान: आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार, रोगों का निदान किया जाता है। इसमें रोगी की नाड़ी परीक्षा, मल-मूत्र परीक्षा, जीभ और त्वचा की जांच, आँखों की जाँच आदि शामिल होते हैं।
- दोषों का संतुलन: आयुर्वेद में तीन मुख्य दोष (वात, पित्त, कफ) होते हैं। कायचिकित्सा में इन दोषों के असंतुलन को संतुलित करने के लिए उपचार किया जाता है।
- औषधियों का प्रयोग: विभिन्न जड़ी-बूटियों, खनिजों और प्राकृतिक तत्वों का उपयोग करके औषधियों का निर्माण और प्रयोग किया जाता है। ये औषधियाँ शरीर के दोषों को संतुलित करने और रोगों का उपचार करने में सहायक होती हैं।
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