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Garbha Vigyana

Original price was: ₹175.00.Current price is: ₹140.00.pc

Garbha Vyakaranam

Original price was: ₹225.00.Current price is: ₹180.00.pc

Garud Puran

Original price was: ₹300.00.Current price is: ₹200.00.pc

Garud Puranam (Bhasha Tika)

Original price was: ₹200.00.Current price is: ₹140.00.pc

Garuda Purana Ek Adhyayan (गरुड़ पुराण)

Original price was: ₹300.00.Current price is: ₹240.00.pc

Garuda Puranam

Original price was: ₹75.00.Current price is: ₹60.00.pc

Garun Puranam (गरुडमहापुराणम्)

Original price was: ₹1,800.00.Current price is: ₹1,440.00.pc

Garunda Mahapuran

Original price was: ₹1,800.00.Current price is: ₹1,440.00.pc

Gastritis & Peptic Ulcer Ayurveda Perspective

Original price was: ₹95.00.Current price is: ₹76.00.pc

Gaudapadasar गौडपादसार: (Vol 1-2)

Original price was: ₹500.00.Current price is: ₹450.00.pc

Gautmiyamaha Tantra गौतमीयमहातन्त्रम्

Original price was: ₹450.00.Current price is: ₹360.00.pc

Gayatri Brahma Vidya गायत्री ब्रह्मविद्या:

Original price was: ₹350.00.Current price is: ₹280.00.pc

Gayatri Mahatantram गायत्रीमहातन्त्रम्

Original price was: ₹550.00.Current price is: ₹440.00.pc

Gherand Samhita (घेरंड संहिता)

Original price was: ₹595.00.Current price is: ₹476.00.pc

Gherand Samhita Of Gherand Muni

Original price was: ₹450.00.Current price is: ₹360.00.pc

Gheranda Samhita

60.00pc

घेरण्डसंहिता योगतन्त्र का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के रचयिता महर्षि घेरण्ड हैं। ग्रन्थ घेरण्ड एवं चण्डकापालि के संवाद के रूप में लिखा गया है। इस ग्रन्थ में योग की तान्त्रिक पद्धति का वर्णन किया गया है। ग्रन्थ में यौगिक षट्कर्मों- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, मुद्रा एवं समाधि का विस्तार से वर्णन किया गया है।
ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार से किया गया है कि यह सर्व साधारण की समझ में आ जाय। प्रस्तुत ग्रन्थ के सम्पादन में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। उपलब्ध ग्रन्थ के समस्त संस्करण नितान्त ही अशुद्ध एवं भ्रामक हैं। श्लोकों में भी भारी अशुद्धियाँ उपलब्ध संस्करणों में देखने को मिलती हैं। किसी-किसी प्रकाशन के संस्करण में तो ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया है, जिससे ग्रन्थ समझ में आने के स्थान पर पाठक भ्रमित ही हो जाता है।
इस हिन्दी अनुवाद में प्रयास किया गया है कि संस्कृतमय मूल एवं अनुवाद हिन्दी दोनों ही शुद्ध रूप में बने रहें । ग्रन्थ का अनुवाद किस प्रकार से हुआ है। यह तो पाठकों के ऊपर ही निर्भर करेगा ।