“प्राकृत प्रकाश” वररुचि द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो प्राकृत भाषा और व्याकरण पर आधारित है। इस ग्रंथ का संपादन और व्याख्या जामुना पाठक द्वारा की गई है।
प्राकृत भाषाएँ प्राचीन भारत की लोकभाषाएँ थीं, जो व्यापक रूप से प्रचलित थीं और साहित्यिक रचनाओं में भी प्रयोग की जाती थीं। “प्राकृत प्रकाश” प्राकृत भाषाओं की व्याकरणिक संरचना, उनके नियमों और विशेषताओं का विशद वर्णन करता है। वररुचि, जो इस ग्रंथ के मूल लेखक हैं, ने प्राकृत भाषाओं के नियमों को सरल और सुबोध तरीके से प्रस्तुत किया है।
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