मुक्तिवाद” पंडित धुंधिराज शास्त्री द्वारा एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो न्याय दर्शन और उसके विभिन्न पहलुओं पर आधारित है। यह ग्रंथ भारतीय तत्त्वमीमांसा के मुक्ति सिद्धांतों पर विस्तृत चर्चा करता है।
पंडित धुंधिराज शास्त्री ने इस ग्रंथ में मुख्य रूप से अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को स्पष्ट किया है। उन्होंने ब्रह्म, आत्मा, और माया के बारे में विस्तार से समझाया है और कैसे आत्मा को माया से मुक्ति मिल सकती है, इस पर गहराई से विचार प्रस्तुत किए हैं। इस ग्रंथ में शास्त्री जी ने मुक्तिवाद के विभिन्न दृष्टिकोणों, जैसे कि कर्म योग, भक्ति योग, और ज्ञान योग पर भी प्रकाश डाला है।
उनका यह ग्रंथ न केवल धार्मिक और तात्त्विक अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह न्याय दर्शन के छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए भी उपयोगी है। शास्त्री जी ने तर्क और शास्त्रार्थ के माध्यम से मुक्ति की अवधारणा को स्पष्ट किया है और इसे साधना और अनुभव के स्तर पर कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इस पर भी विचार किए हैं।
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